बांसवाड़ा जिले की महिलाओं का पुरुषों के साथ बराबर आय का स्रोत में भागीदारी का वर्णन
(Description of the Participation of Women of Banswara District in Sources of Income Equal to That of Men)
Manoj Singh
Assistant Professor- Geography, Govind Guru Tribal University, Banswara, Rajasthan.
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
बांसवाड़ा जिला, जो राजस्थान राज्य के दक्षिणी हिस्से में स्थित है, एक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र है। यहां की महिलाएं पारंपरिक रूप से कृषि, बागवानी, और पशुपालन जैसी गतिविधियों में भागीदारी करती हैं, जिससे उनका आय का स्रोत मुख्यतः इन कार्यों पर निर्भर करता है। हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में बांसवाड़ा में महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है। अब वे पुरुषों के साथ बराबरी की आय का हिस्सा साझा कर रही हैं। इस सुधार की प्रक्रिया में कई कारक जिम्मेदार हैं, जिनमें शिक्षा, स्वयं सहायता समूहों का विकास, और ग्रामीण विकास योजनाएं शामिल हैं। बांसवाड़ा की महिलाएं अब खुद को सशक्त महसूस कर रही हैं और विभिन्न गतिविधियों में पुरुषों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। यहाँ पर बांसवाड़ा जिले की महिलाओं के पुरुषों के साथ बराबरी के आय स्रोत में भागीदारी को विस्तार से समझेंगे।
KEYWORDS: कृषि, बागवानी, पशुपालन, स्वयं सहायता समूह, सरकारी योजनाएं, महिला सशक्तिकरण, MGNREGA] NRLM] PMEGP, महिला श्रमिक, सामाजिक परिवर्तन, महिला अधिकार, आर्थिक सशक्तिकरण, रोजगार, वित्तीय सहायता, शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल साक्षरता, स्वास्थ्य सेवाएं, आय का समान भाग, कृषि कार्य, उत्पादकता में वृद्धि, जल प्रबंधन, सिंचाई, फसल उत्पादन, स्वयं रोजगार, उद्यमिता, घरेलू उद्योग, संसाधन प्रबंधन, सामूहिक कार्य, महिला नेतृत्व, पारंपरिक कृषि, ग्रामीण महिला श्रमिक, परिवार की आय में योगदान, कृषि उत्पाद बाजार, आर्थिक स्वतंत्रता, समाज में समानता, नारी जागरूकता, वित्तीय स्वतंत्रता।
INTRODUCTION:
वर्तमान भारतीय समाज में परिवार में महिलाओं की भूमिका का व्यापक महत्त्व हैं। समाजशास्त्रीय शोध संकलन में समाज वैज्ञानिकों द्वारा महिला का अध्ययन समाज की दशा, दिशा एवं सामाजिक, आर्थिक राजनैतिक सास्कृतिक क्षेत्र में महिलाओं की बदलते प्रतिमानों पर अनेक शोध कार्य हुए हैं, परन्तु समकालीन परिवार में महिलाओं की भूमिका विषय को लेकर कोई विशेष कार्य अब तक नहीं हुआ है। जबकि पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं की परिवार में भूमिका के प्रति व्यापक जागृति आई है। परिवार एक विशिष्ट संस्था हैं क्योंकि यह एक ही समय पर एक निजी और एक सार्वजनिक संस्था है। विभिन्न संदर्भों में यह सबसे निजत्व से लेकर सबसे सार्वजनिक संस्था का प्रतिनिधित्व करती है। इसके साथ ही परिवार एक सार्वभौमिक संस्था भी है। परिवार की दिन-प्रतिदिन की व्यवहार गतिशीलता में इतने अधिक अन्तर एवं बदलाव हैं कि हम उन्हें कुछ निश्चित संरचनात्मक सिद्धांतों के आधार पर नहीं समझ सकते। इसी कारण परिवार परम्परागत संरचनात्मक मानवशास्त्र में बहुत अधिक महत्त्व स्थापित नहीं कर सका। परन्तु इन सबके बावजूद परिवार एक ऐसा धरातल हैं जहाँ यौनिकता तथा विनिमय, संस्तरण एवं पारस्परिक प्रभावमूलक सम्बन्धों के संरचनात्मक सिद्धान्त निर्मित, नियमित एवं पुनर्निर्मित होते हैं और समय-समय पर उन्हें परिवार में दिन-प्रतिदिन का जीवन ’आदर्श’एवं यथार्थ के बीच संतुलन को दर्शाता है। भारतीय परिवार की साहित्यिक अवधारणाओं से सम्बद्ध अनेक वैचारिक पक्ष ब्रिटिश विधिक पुनर्व्याख्याओं के कारण और अधिक जटिल हो जाते हैं। वंशानुगत बुद्धिजीवी अथवा साहित्यकारों की चूँकि अपनी परम्पराएँ, अभिवृत्तियाँ, पूर्वाग्रह एवं रूचि थी, जिससे भारतीय परिवार के विषय में की गई व्याख्याएँ एवं टिप्पणियाँ भी प्रभावित हुई हैं। पारिवारिक समूह एवं गृहस्थी की अवधारणाएँ परिवार के प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण को स्पष्ट करती हैं और इसी के द्वारा परिवार के जीवन्त यथार्थ का सामाजशास्त्रीय विश्लेषण सम्भव हो पाता हैं। भारतीय साहित्यिक परम्परा में परिवारों को जिस प्रकार लिपिबद्ध एवं विवेचित किया गया हैं, वैसा वर्णन दक्षिण भारत में विशेषतः मातृवंशीय नायरों के संयुक्त परिवार से मेल नहीं खाता। महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सांस्कृतिक आदि भूमिका एवं महत्त्व का बोध होगा। परिवार को अपने सातत्य और नैरन्तर्य को बनाए रखना चाहिए। नैरन्तर्य की बहुत बड़ी परम्परा वंश है। विस्तृत होती अर्थव्यवस्था में महिलाएँ भी अब कार्य कर रही हैं तथा जीवन स्तर को उठा रही हैं। ऐसे परिवारों में पुरुष स्त्रियों को समान व्यवहार देने लगे हैं। यद्यपि कामकाजी महिलाओं के परिवारों के यह सब चर्चा नहीं होती हैं। महिला क्योंकि परिवार में कोई आर्थिक योगदान नहीं देती हैं. अतः इन परिवारों में पुरुष उनसे अधिक सम्मान की अपेक्षा करते हैं। जब तक घर का कामकाज व बच्चों का लालन-पालन महिला का उत्तरदायित्व रहेगा, तब तक कोई भी परिवार व्यवस्था महिलाओं को पूर्ण बराबरी का दर्जा प्रदान नहीं करेगी।
यहाँ पर बांसवाड़ा जिले की महिलाओं के पुरुषों के साथ बराबरी के आय स्रोत में भागीदारी को विस्तार से समझते हैंः
कृषि क्षेत्र में भागीदारी - बांसवाड़ा के अधिकांश लोग कृषि से जुड़े हुए हैं। पारंपरिक रूप से कृषि कार्य में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से घरेलू स्तर तक सीमित रही है, जैसे कि खाना पकाना, खेतों में हल चलाना, बीज बोना आदि। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में महिलाएं पुरुषों के साथ मिलकर मुख्य कृषि कार्यों में भी भाग ले रही हैं। कृषि में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के कारण उनकी आय में भी वृद्धि हुई है। महिलाएं अब पुरुषों के साथ मिलकर खेतों में काम करती हैं, बीज बोती हैं, पानी देती हैं और फसल काटने के काम में भी सक्रिय रूप से शामिल होती हैं। इस भागीदारी से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी है, बल्कि यह उनकी सामाजिक स्थिति में भी सुधार का कारण बनी है। बांसवाड़ा जिले की महिलाओं की कृषि क्षेत्र में भागीदारी ने उनके जीवन स्तर को सुधारा है और उनकी सामाजिक स्थिति को सशक्त किया है। बांसवाड़ा जिले, जो राजस्थान के दक्षिणी भाग में स्थित है, एक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र है, जहां कृषि मुख्य रूप से जीवन यापन का प्रमुख स्रोत है। यहाँ की महिलाएं पारंपरिक रूप से कृषि कार्यों में पुरुषों के साथ मिलकर भाग ले रही हैं, और समय के साथ उनका योगदान बढ़ा है। यह बदलाव उनके जीवन में व्यापक आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन लेकर आया है। बांसवाड़ा जिले की महिलाएं सदियों से कृषि कार्यों में शामिल रही हैं, लेकिन पारंपरिक रूप से उनका योगदान सीमित था। महिलाओं का काम मुख्यतः घरेलू स्तर तक था जैसे कि खाना पकाना, परिवार का ध्यान रखना, और फसल काटने के बाद उत्पादों को संभालना। हालांकि, कृषि कार्यों में उनका योगदान पुरुषों के मुकाबले कम था, लेकिन अब स्थितियाँ बदल चुकी हैं। बांसवाड़ा में महिलाएं अब कृषि में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रही हैं। वे खेतों में बीज बोने, सिंचाई करने, फसल काटने, और छांटने जैसे कार्यों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। पहले जहां ये कार्य केवल पुरुषों के जिम्मे होते थे, वहीं अब महिलाएं भी इन सभी गतिविधियों में शामिल होती हैं। इन कार्यों में महिलाओं का योगदान विशेष रूप से जब बढ़ा, जब कृषि में उन्नत तकनीकों का उपयोग हुआ, और जब कृषि क्षेत्र में अधिक श्रम शक्ति की आवश्यकता महसूस हुई। बांसवाड़ा में महिलाओं की कृषि कार्यों में भागीदारी का कारण कुछ मुख्य पहलुओं पर आधारित हैः कृषि में नवाचार और उन्नत कृषि तकनीकों के प्रयोग ने महिलाओं के लिए कृषि कार्य को आसान बना दिया। इससे महिलाओं को पहले की तुलना में ज्यादा श्रमसाध्य कार्यों में भी भाग लेने का अवसर मिला।
महिला साक्षरता दर में वृद्धि ने महिलाओं को कृषि क्षेत्र में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सक्षम बनाया। महिलाएं अब कृषि में नए विचारों और तरीकों को लागू करने में सक्षम हैं, जिससे उनका योगदान बढ़ा है। बांसवाड़ा के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों की जागरूकता बढ़ने के बाद, सामाजिक ढांचे में बदलाव आया। महिलाएं अब परिवार और समुदाय में समान रूप से निर्णय लेने में भागीदार हैं, जिससे उनकी कृषि गतिविधियों में भी हिस्सेदारी बढ़ी है। पहले जहाँ महिलाएं कृषि में सिर्फ शारीरिक श्रम का ही हिस्सा बनती थीं, वहीं अब आधुनिक कृषि उपकरणों और यांत्रिकीकरण के उपयोग से उनकी भूमिका में बदलाव आया है। अब महिलाएं ट्रैक्टर चलाने, मशीनों का उपयोग करने, और अन्य तकनीकी कामों में भाग ले रही हैं। इस प्रकार की भूमिका उनके आर्थिक सशक्तिकरण का कारण बन रही है। बांसवाड़ा की महिलाएं सिंचाई प्रबंधन में भी पुरुषों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। वे खेतों में पानी देने, नहरों की सफाई, और पानी की बचत के लिए विभिन्न तरीकों का पालन करती हैं। महिलाओं का सिंचाई प्रबंधन में योगदान बहुत अहम है, क्योंकि यह कृषि के सफल संचालन के लिए अत्यधिक आवश्यक है। महिलाएं कृषि कार्यों में समान योगदान दे रही हैं, और इस भूमिका में उनका आर्थिक हिस्सा बढ़ा है। महिलाओं द्वारा किए गए सिंचाई कार्यों ने खेतों की उपज बढ़ाई है, जिससे परिवार की आय में वृद्धि हुई है। फसल कटाई में महिलाओं की भागीदारी पारंपरिक रूप से बहुत अधिक थी, लेकिन अब यह पहले से भी अधिक बढ़ गई है। महिलाएं गेंहू, बाजरा, चावल और अन्य फसलों की कटाई में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रही हैं। इसके साथ ही, वे कटाई के बाद उत्पादों को छांटने, पैक करने और बाजार में बेचने के कार्य में भी सहायक होती हैं। महिलाएं अब कृषि उत्पादन से जुड़ी गतिविधियों के अलावा, बाजार में उत्पादों की बिक्री में भी भाग ले रही हैं। वे फल, सब्जियाँ, और अन्य कृषि उत्पाद बाजार में बेचने के लिए जाती हैं, जिससे उनकी आय का स्तर बढ़ता है। बांसवाड़ा की महिलाएं अब सिर्फ उपज की कटाई और उत्पादन में नहीं, बल्कि विपणन, पैकेजिंग और वितरण कार्यों में भी भागीदार बन चुकी हैं। बांसवाड़ा जिले में स्वयं सहायता समूह का गठन महिलाओं के कृषि कार्यों में बढ़ती भागीदारी का एक महत्वपूर्ण कारण है। इन समूहों के माध्यम से महिलाएं अपने कृषि कार्यों को और बेहतर ढंग से चला रही हैं। वे मिलकर बीजों की खरीद, कृषि उत्पादों की बिक्री, और कृषि के लिए आवश्यक अन्य संसाधनों की आपूर्ति करती हैं। बांसवाड़ा में महिलाओं की कृषि में भागीदारी के साथ सामाजिक बदलाव भी देखा गया है। पहले जहां महिलाएं केवल घरेलू कार्यों तक सीमित थीं, अब वे परिवार और समाज में पुरुषों के बराबर कृषि कार्यों में भाग ले रही हैं। सामूहिक कार्य के द्वारा महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि वे पुरुषों के समान खेतों में काम करने में सक्षम हैं। यह बदलाव न केवल उनकी सामाजिक स्थिति को मजबूत करता है, बल्कि यह उन्हें आर्थिक रूप से भी सशक्त बनाता है। अब महिलाएं कृषि कार्यों से अपनी परिवार की आय में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। महिलाएं कृषि मजदूरी के रूप में भी भागीदारी कर रही हैं। बांसवाड़ा जिले में कृषि श्रमिक संघों का गठन हुआ है, जिसमें महिलाएं सक्रिय रूप से शामिल हैं। वे विभिन्न प्रकार के कृषि कार्यों में मजदूरी प्राप्त करती हैं, जैसे कि भूमि की जुताई, बीज बोना, सिंचाई, और कटाई के कार्य। यह महिलाओं के लिए एक नया आय स्रोत बन गया है, और इससे उनका आर्थिक सशक्तिकरण हुआ है। महिलाएं अब अपने परिवार की आय में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। पहले जहां पुरुषों का कृषि से मुख्य आय का स्रोत था, अब महिलाएं भी इस आय में भागीदार हो गई हैं। इसके साथ ही, महिलाओं के बढ़ते योगदान से परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है, और परिवार के सभी सदस्य अब बेहतर जीवन स्तर का आनंद ले रहे हैं। बांसवाड़ा जिले की महिलाओं ने कृषि क्षेत्र में पुरुषों के साथ बराबरी की भागीदारी करके अपने जीवन को सशक्त किया है। कृषि में उनकी भागीदारी ने न केवल उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार किया है, बल्कि सामाजिक ढांचे में भी बदलाव लाया है। अब महिलाएं कृषि क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं, और इसके परिणामस्वरूप उनके अधिकार और अवसर भी बढ़े हैं।
स्वयं सहायता समूह:- स्वयं सहायता समूहों का गठन बांसवाड़ा जिले में महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ है। इन समूहों के माध्यम से महिलाएं छोटे व्यवसायों की शुरुआत करती हैं, जैसे कि हस्तशिल्प, सिलाई, बर्तन निर्माण, और अन्य घरेलू उत्पादों की बिक्री।
स्वयं सहायता समूहों के द्वारा महिलाओं को लघु-व्यवसाय करने का अवसर मिलता है, जिससे वे पुरुषों के साथ मिलकर आय का समान हिस्सा प्राप्त करती हैं। इसके अलावा, समूहों के माध्यम से उन्हें वित्तीय सहायता भी मिलती है, जिससे वे अपने व्यवसायों को विस्तार दे पाती हैं।
बागवानी और फलोत्पादन:- बांसवाड़ा जिले की महिलाएं बागवानी में भी सक्रिय रूप से भाग लेती हैं। वे फल-फूलों की खेती, सब्जियों की बागवानी, और अन्य कृषि उत्पादों की खेती करती हैं। इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से उनका आर्थिक स्तर भी ऊंचा हुआ है। जब महिलाएं बागवानी के कार्यों में भाग लेती हैं, तो उनका हिस्सा पुरुषों के साथ समान रूप से साझा होता है। विशेष रूप से फलोत्पादन और सब्जियों के व्यापार में महिलाएं अपनी भूमिका निभाती हैं, जो उनके आर्थिक सशक्तिकरण का कारण बनता है।
पशुपालन:- पशुपालन भी बांसवाड़ा के ग्रामीण इलाकों में एक महत्वपूर्ण आय का स्रोत है। महिलाओं का इसमें महत्वपूर्ण योगदान है, क्योंकि वे जानवरों को खिलाना, उनकी देखभाल करना और दूध बेचने का काम करती हैं। पशुपालन के माध्यम से महिलाएं पुरुषों के साथ आय की समान भागीदार बन चुकी हैं। इसके अलावा, महिलाएं बकरियां, गाय, मुर्गियां और अन्य जानवरों की खरीद-बिक्री में भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं, जिससे उनके घरों में अतिरिक्त आय का स्रोत बनता है।
शिल्प और हस्तनिर्मित उत्पाद - बांसवाड़ा जिले की महिलाएं पारंपरिक शिल्पकला और हस्तनिर्मित उत्पादों में भी माहिर हैं। वे विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प, जैसे कि कंबल बुनाई, कालीन, आभूषण निर्माण, और मिट्टी के बर्तन बनाती हैं। इन उत्पादों को स्थानीय बाजारों में बेचा जाता है, और इनका व्यापार महिलाओं के लिए एक स्थिर आय का स्रोत बन चुका है। इस क्षेत्र में भी महिलाओं की पुरुषों के साथ समान भागीदारी हो रही है, जिससे उनके आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है।
सामाजिक और सरकारी योजनाओं का लाभ - बांसवाड़ा जिले में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कई सरकारी और गैर-सरकारी योजनाएं भी चल रही हैं। इन योजनाओं के माध्यम से महिलाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, और आर्थिक सहायता प्राप्त करती हैं। महिलाओं को विभिन्न योजनाओं के तहत प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें और आय के स्रोतों में पुरुषों के साथ समान भागीदारी कर सकें। बांसवाड़ा जिले की महिलाओं के सशक्तिकरण और आय के स्रोतों में बराबरी की भागीदारी के लिए विभिन्न सामाजिक और सरकारी योजनाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन योजनाओं ने महिलाओं को न केवल आर्थिक रूप से सशक्त किया, बल्कि उनके सामाजिक अधिकारों और अवसरों को भी बढ़ाया है। सरकार और समाज ने मिलकर बांसवाड़ा जिले की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिससे वे पुरुषों के साथ बराबरी के आधार पर आय के स्रोतों में सक्रिय भागीदार बन सकी हैं। राजस्थान राज्य और केंद्र सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं लागू की हैं, जिनका उद्देश्य उन्हें समान अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य और वित्तीय सहायता प्रदान करना है। इन योजनाओं ने बांसवाड़ा जिले की महिलाओं को पुरुषों के साथ समान आय के स्रोतों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना महिलाओं को रोजगार प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रही है। बांसवाड़ा जिले की महिलाएं इस योजना के तहत कृषि कार्यों, सड़क निर्माण, जल संरक्षण, और अन्य ग्रामीण विकास कार्यों में रोजगार प्राप्त करती हैं। महिला श्रमिकों को पुरुषों के समान श्रमिक दरों पर काम मिलता है, जिससे उनके परिवारों की आय में वृद्धि होती है। मनेरेगा ने महिलाओं को भूमि सुधार और जल प्रबंधन जैसे कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर दिया है। इसके अलावा, योजना में महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे उनकी भागीदारी बढ़ी है और वे अब पुरुषों के साथ समान रूप से आर्थिक गतिविधियों में शामिल हो रही हैं।
शिक्षा और जागरूकता:-
बांसवाड़ा जिले में महिला शिक्षा पर जोर दिया गया है, और अब महिलाएं विभिन्न पेशेवर कार्यों में भाग ले रही हैं। शिक्षा के माध्यम से महिलाओं ने न केवल अपनी सामाजिक स्थिति में सुधार किया है, बल्कि वे अब परिवार की आर्थिक स्थिति में भी योगदान दे रही हैं। शिक्षा से जागरूकता में भी वृद्धि हुई है, और महिलाएं अब कृषि, व्यवसाय, और अन्य आय के स्रोतों के बारे में बेहतर तरीके से जानती हैं। इसके परिणामस्वरूप, वे पुरुषों के साथ आय के समान हिस्से में भागीदारी कर पा रही हैं।
निष्कर्षः
बांसवाड़ा जिले की महिलाएं अब पुरुषों के साथ आय के स्रोतों में समान रूप से भागीदारी करती हैं, चाहे वह कृषि, बागवानी, पशुपालन, शिल्प, या स्वयं सहायता समूह के माध्यम से हो। उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में यह सुधार उनके सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता का संकेत है। यह बदलाव न केवल महिलाओं के लिए लाभकारी है, बल्कि पूरे समुदाय के लिए एक सकारात्मक कदम है, जिससे उनकी जीवन स्तर में सुधार हुआ है और उन्हें एक समान और सम्मानजनक स्थान मिला है।
संदर्भ सूची:-
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Received on 08.01.2025 Revised on 24.01.2025 Accepted on 19.02.2025 Published on 25.03.2025 Available online from March 31, 2025 Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2025; 13(1):33-37. DOI: 10.52711/2454-2687.2025.00006 ©A and V Publications All right reserved
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